क्या यही सत्य है। जीवन की आपाधापी में हम कहि सांस लेना नही भूल जाये। दौड़े चले जारहे है अंधी दौड़ में बेतहाशा
Sunday, August 25, 2019
Saturday, April 20, 2019
सहजता
सोचते थे
कभी ऐसा इंसान मिलेगा
जो 'जैसा' दिखता हो
'वैसा' ही होगा
लेकिन
यह सोचते सोचते
स्वयम में अपने आप को
तलाशने लगा हु
शायद अपने इंसान को
कसौटी पे लगा रखा है
आज अल सुबह अंधियारे में
घण्टियों की आवाज़ के साथ
अनहोनी सी महसूस हुई
बगल के बाबा ने खुदकशी की थी
एक बार फिर सोच रहा हु
जो जैसा दिखता है
वैसा ही होता है क्या ?
-अविनाश जोशी
सम्भावना
सम्भावनाये हकीकत होना चाहतीहै
लेकिन मौलिकता आड़े आती है
बस यही अंतर्द्वंद
जीवन की राह तय करता है
यह तड़फ कभी कभी
फफक में बदल जाती है
निजत्व का अहसास
सम्भावनाये नही छोड़ पाती
बस एक बार फिर
हमेशा की तरह
आशंका हकीकत में बदल जाती है
ओर फिर शुरू होता है
एक नया सफर
सम्भावनाओं को हकीकत में
तब्दील करने का
-अविनाश जोशी
मौन
मौन एक साधना है
लेकिन हर मर्ज की दवा है
शांत पानी मे कभी
जलजला नही आता
आराध्य की चुप्पी
आस्था का प्रतीक है
दुआ ओर नाराजगी
सब कुछ
मौन में ही निहित है
बस तिलिस्म है
स्वयम प्रतिमा
प्रतिरूप बदल बदल
सदैव मौन रहकर
शांत अलौकिक
आशीर्वाद की गंगा
बहाती रहती है।।
-अविनाश जोशी
सार्थकता
ज़िन्दगी अंकुरित होने लगी
अचानक एक पुष्प ने पूछा
स्वयम की सुगन्ध महसूस की है कभी
सच कहूं तो
कस्तूरी की तरह ढूंढ रहा हु
एवम असहाय सा ठगा सा
चुपचाप एक व्रक्ष के रूप में
बड़ा होता जा रहा हु
यह क्या अब तो
पुष्प ने भी नाता तोड़ लिया है
बस पत्तो के सहारे
बगल के पोधो की खुशी से
स्वयम को पोषित कर लेता हूं
हा कभी कभी कुछ आशावादी
पूजा के तौर पे कुछ पुष्प चढ़ा देते है
तब अपना अतीत याद कर
बस मुस्करा देता हूं ।।
-अविनाश जोशी