ज़िन्दगी अंकुरित होने लगी
अचानक एक पुष्प ने पूछा
स्वयम की सुगन्ध महसूस की है कभी
सच कहूं तो
कस्तूरी की तरह ढूंढ रहा हु
एवम असहाय सा ठगा सा
चुपचाप एक व्रक्ष के रूप में
बड़ा होता जा रहा हु
यह क्या अब तो
पुष्प ने भी नाता तोड़ लिया है
बस पत्तो के सहारे
बगल के पोधो की खुशी से
स्वयम को पोषित कर लेता हूं
हा कभी कभी कुछ आशावादी
पूजा के तौर पे कुछ पुष्प चढ़ा देते है
तब अपना अतीत याद कर
बस मुस्करा देता हूं ।।
-अविनाश जोशी
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