Saturday, April 20, 2019

अनभिज्ञ

भौतिक साधनों की पराकाष्ठा

जीवन को  कई रंगों से अनभिज्ञ रख देती है

-अविनाश जोशी

शरणागत

शरणागत होना एक प्रक्रिया है

आसक्ति चाहे ईश्वर के प्रति हो या व्यक्ति के

-अविनाश जोशी

ज़िन्दगी

एक कदम तुम्हारा
एक कदम हमारा
बस ज़िन्दगी
युही कटती रहे।।

-अविनाश जोशी

आईना

आईने में चेहरा साफ़ कर लिया लेकिन
अहम साफ़ हो जाये
ऐसा आइना कहा से लाऊ

-अविनाश जोशी

दुआ

दुआ में बहुत ताकत है साहिब

अक्सर  लोग पत्थरो को भी खुदा  मान लेते है
-अविनाश जोशी

सहजता

सोचते थे
कभी ऐसा इंसान मिलेगा

जो 'जैसा' दिखता हो
'वैसा' ही होगा

लेकिन
यह सोचते सोचते
स्वयम में अपने आप को
तलाशने लगा हु
शायद अपने इंसान को
कसौटी पे लगा रखा है

आज अल सुबह अंधियारे में
घण्टियों  की आवाज़ के साथ
अनहोनी सी महसूस हुई
बगल के बाबा ने खुदकशी की थी

एक बार फिर सोच रहा हु
जो जैसा दिखता है
वैसा ही होता है क्या ?

-अविनाश जोशी

माँ

दुआएं होंगी माँ की

लाख हम समझे की घर हमारी कमाई से चलता है

-अविनाश जोशी

शहर

शुक्र है मैरा शहर आज भी मासुम और नादान है

उन्नत नही है तो कोई बात नही

-अविनाश जोशी

फकीर

फकीर घबड़ाता है मिलने मिलाने से

पता नही किसने तोहफे  की रिवायत चालू की

-अविनाश जोशी

चराग

सलाह उसे दो जिसे जरूरत हो

चरागों को भी उजालो में कोई नही पूछता

-अविनाश जोशी

सियासत

सियासत किसी की रियासत नही

बस तहज़ीब की रिवायत पे गौर करे.....

-अविनाश जोशी

दिल

सबका दिल रखता हूं

शायद

इसलिए अपना दिल
नहि रख पाता

-अविनाश जोशी

आत्म प्रशंसा निरथर्क है

खुशबू से ही पता चल जाता है

पुष्प का नाम

-अविनाश जोशी

सम्भावना

सम्भावनाये हकीकत होना चाहतीहै
लेकिन मौलिकता आड़े आती है
बस यही अंतर्द्वंद
जीवन की राह तय करता है
यह तड़फ कभी कभी
फफक में बदल जाती है
निजत्व का अहसास
सम्भावनाये नही छोड़ पाती
बस एक बार फिर
हमेशा की तरह
आशंका हकीकत में बदल जाती है
ओर फिर शुरू होता है
एक नया सफर
सम्भावनाओं को हकीकत में
तब्दील करने का

-अविनाश जोशी

मौन

मौन एक साधना है
लेकिन हर मर्ज की दवा है
शांत पानी मे कभी
जलजला नही आता
आराध्य की चुप्पी
आस्था का प्रतीक है
दुआ ओर नाराजगी
सब कुछ
मौन में ही निहित है
बस तिलिस्म है
स्वयम प्रतिमा
प्रतिरूप बदल बदल
सदैव मौन रहकर
शांत अलौकिक
आशीर्वाद की गंगा
बहाती रहती है।।

-अविनाश जोशी

सार्थकता

ज़िन्दगी अंकुरित होने लगी
अचानक एक पुष्प ने पूछा
स्वयम की सुगन्ध महसूस की है कभी
सच कहूं तो
कस्तूरी की तरह ढूंढ रहा हु
एवम असहाय सा ठगा सा
चुपचाप एक व्रक्ष के रूप में
बड़ा होता जा रहा हु
यह क्या अब तो
पुष्प ने भी नाता तोड़ लिया है
बस पत्तो के सहारे
बगल के पोधो की खुशी से
स्वयम को पोषित कर लेता हूं
हा कभी कभी कुछ आशावादी
पूजा के तौर पे कुछ पुष्प चढ़ा देते है
तब अपना अतीत याद कर
बस मुस्करा देता हूं ।।

-अविनाश जोशी